हर शाम, सूर्यास्त के ठीक बाद, दशाश्वमेध घाट एक साथ रंगमंच, मंदिर और उत्सव बन जाता है। एक जैसी धोती पहने युवा पुजारी भारी पीतल के दीप उठाते हैं, शंख बजते हैं, घंटियाँ गूँजती हैं, और धुआँ गंगा पर तैरता है जबकि सैकड़ों लोग मौन और गीत में डूब जाते हैं।

कब और कहाँ

आरती गर्मियों में करीब 6:45 बजे और सर्दियों में थोड़ा पहले शुरू होती है, और लगभग 45 मिनट चलती है। दशाश्वमेध सबसे भव्य है; अस्सी घाट पर भी एक प्यारी, थोड़ी शांत आरती होती है।

सबसे अच्छी जगह

सच कहूँ? नाव। एक घंटा पहले नाव लीजिए और जल से पूरे घाट को जगमगाते देखिए। ज़मीन से देखना हो तो 6 बजे तक पहुँच कर साफ़ नज़ारे वाली सीढ़ी पकड़ लीजिए।

आप हवा में राख, मन में एक धुन, और यह सुखद एहसास लेकर लौटेंगे कि आपने अपने से कहीं पुरानी किसी चीज़ को देखा है।